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गीत

तुमने छोड़ा शहर
धूप दुबली हुई
पीलिया हो गया है अमलतास को

बीच में जो हमारे ये दीवार थी
पारदर्शी इसे वक्त ने कर दिया
शब्द तुम ले चलीं गुनगुनाते हुए
मैं संभाले रहा रिक्त ये हाशिया

तुमने छोड़ा शहर
तम हुआ चम्पई
नीन्द आती नहीं है हरी घास को

अश्वरथ से उतर कर रुका द्वार पर
पत्र अनगिन लिए सूर्य का डाकिया
फिर मेरा नाम ले कर पुकारा मुझे
दूरियों के नियम फेंक कर चल दिया

तुम ने छोड़ा शहर
उड़ रही है रुई
ढक रहे फूल सेमल के आकाश को

दौड़ता ही रहा अनवरत मैं यहाँ
तितलियों जैसे क्षण हाथ आए नहीं
जिन्दगी का उजाला छिपा ही रहा
दिन ने मुख से अधेंरे हटाए नहीं

तुमने छोड़ा शहर
याद बन कर जूही
फिर से महका रही घर की वातस को

भीड़ के इस समन्दर में हम अजनबी
एक अदृश्य बंधन में बंध कर रहे
जंगलों में रहे, पर्वतों में रहे
हम जहाँ भी रहे कोरे कागज रहे

तुमने छोड़ा शहर
नाव तट से खुली
शंख देखा किए रेत की प्यास को
      ✍️कुमार शिव 

गीत- रविन्द्र भ्रमर

आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।

रंग पंखुरी केसर टहनी नस-नस के सब ताने-बाने,
उनमें कोमल फूल बना जो, भोली आँख उसे ही 



जाने,
मन ने सौरभ के वातायन से--
असली रस भाँप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था
मन ने उसको छाप लिया।

छवि की गरिमा से मंडित, उस तन की मानक ऊँचाई को,
स्नेह-राग से उद्वेलित उस मन की विह्वल तरुणाई को,
आँखों ने छूना भर चाहा,
मन ने पूरा नाप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।

आँख पुजारी है, पूजा में भर अँजुरी नैवेद्य चढ़ाए,
वेणी गूँथे, रचे महावर, आभूषण ले अंग सजाए,
मन ने जीवन-मंदिर में-
उस प्रतिमा को ही थाप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।
         (रविंद्र भ्रमर)

पानी पर

तेरी मेरी युगों तक कहानी रहे
तो जरुरी है नदियों में पानी रहे
ग़र न पानी बचा सब बिखर जायेगा।
इस धरा से तो जीवन उजड़ जायेगा।।

पानी संसार सागर को घेरे अड़ा ।
बर्फ बनकर हिमालय में तनकर खड़ा।
मेघ बनकर गगन से बरसता रहा।
हिन्द का पानी सैनिक के संग भी लड़ा।
देश का आप पानी बचा लीजिये
वरना पानी का पानी उतर जायेगा.............

मत तरन ताल के स्नान से पूछिए।
बन्द बोतल बिके शान से पूछिए
पूछना हो जो पानी की कीमत कभी
आसमां ताकते धान से पूछिए ।
तरु लता जीव जन्तु का आधार है पिण्ड पानी बिना कैसे तर जायेगा.............

गंगा तट तुलसी कबीरा की बानी मिलेे।
यमुना तट मीर जैसी दीवानी मिले।
खिलखिलाती रहे नर्मदा सर्वदा
प्यासे मरुथल को अँजुरी भर पानी मिले।
आज आंगन में सावन सजा लीजिये देखियेगा की कल भी संवर जायेगा।


@अनिल चौबे