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आल्हा छ्न्द


शब्द अर्थ के मध्य विराजो, सुरनायक गणपति महाराज।
रस छन्दों में गति प्रदाता, आकर कंठ समाओ आज।।

करूँ वन्दना भारत माँ की,अक्षर अक्षर उगले आग।
छल छद्मी वैरीजन जिसको,सुने रसातल जायें भाग।।

काले धन पर है कठोर अब, जय जय जय मोदी सरकार।
नोट पाँच सौ बन्द किए सब , बन्द किए हैं एक हजार।।

कर चोरी कर भरे तिजोरी, रखे रहे जो माल छिपाय।
गाज गिरी है उनके ऊपर, छाती कूट कूट चिल्लाय।

बीबी अपने नोट बदलती, अपने पति से आँख बचाय।
ऐसी मार पड़ी मोदी की, मुंह से हाय कही न जाय।।

निर्णय से निर्धन जन खुश है, काला पेट बजाता गाल।
कुछ दिनों की बात है भैया, फिर भारत होगा खुशहाल।।

राधेश्यामी छंद


किसी फिरंगी के सपने में,मूँछों वाला दिख जाता था ।।
रक्त सुबह तक धमनी में जम, हिम के जैसा हो जाता था ।।
जिसकी बलिदानी गाथा की,
नित साक्ष्य इलाहाबाद रहा ।।
अमर लाडला भारत माँ का,आजाद सदा आजाद रहा ।।

अमृतध्वनि छन्द

पं धरीक्षण मिश्र
पं धरीक्षण मिश्र जी के भोजपुरी में अमृतध्वनि छन्द

बन्दना सरस्वती से 


सुरसति हम के द बना, अइसन सुकवि प्रबुद्ध !
लिखल करीं हम सवर्दा छन्दगति यति शुद्ध !
 छन्दगति यति शुद्धमति जस देवग्गणपति !
सत्संगति रति दे द दिन प्रति देविभ्भगवति !
चावस्सिरजति भाव ब्विरचति भूलभ्भरसति !
दोषध्धरसति मोदब्बरसति आवस्सुरसति !!

                               २ 
                     समधी के मरम्मत 
ठनगन समधी नाधि के, बके अन्ट के सन्ट !
बेटिहा भेजले अन्त में लट्ठद्धर कुछ लन्ठ !
लट्ठद्धर कुछ लन्ठज्जबर गरज्जद्धरधर !
धद्धग्गरदन चच्चच्चटकन थत्थत्थप्पर !
गातल्लउरि पिटातस्सब सुधियातत्तनमन !
खातक्कवर सुहात ठ्ठहर भुलातठनगन !!

डमरू घनाक्षरी (अमात्रिक छन्द )

हर हर बम बम जपत रटत नर
   सहज रहत बस झट घट अघ तम !
       भज भगवन राज सर धर मद तज
           भव भय हर डर बढ़त न पगयम !
               नयन उठत जब जरत मदन तन
                   अचरज मत कर वर पर हरदम !
                      उठ चल झट पट घर भर रत रह
                         अचल सफल फल जप हर बमबम !
                                         
                                              २
 
गरम करत जब उमस बढ़त तब
  तन जल बह जस नर कर कसरत !
      लथपथ हरदम वसन बदन पर
        पवन जातन कर सब जन कहरत !
            पग पग पर मग तपकर दहकत
                जरत अगन नभ कस कर झहरत !
                    तपत रहत मन तडपत छन छन
                        लखत नयन घन सघन अनवरत !
                

डमरू घनाक्षरी (एक अमात्रिक छन्द )

डमरू छन्द
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घहर घहर घन गरजत नभ जब
चहकत खग तब डर कर दहशत।
पवन बहत सन उडत बसन फर
मदन अधर पर रस धर हरषत।।
करत जतन तन शठ हठ डट कर
दरस परस मन छन भर तरसत।।
लखत लखत तव अयन अनवरत
सजन नयन जल घन इव बरसत।।
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अचरज मत कर सहज भजन कर
धर धर कर भव पग धर सत सत।
हरत रहत अघ तम हरदम हर
मतलब करतब कर जग तरसत।।
तजत न मद पद भजत न फणधर
सहज कपट झट कर छल हरसत।।
पर बस रमत करत मन ठन गन
सजन ! नयन जल घन इव बरसत।।