हम अक्सर सोचने पर मजबुर हो जाते है कि अगर विज्ञापन न होते तो इस खुदगर्ज जमाने में हमारी इतनी चिन्ता कौन करता ? जितनी भगवान को हमारी अनिवार्य आवश्यकताओं की चिन्ता नही है कही उससे जियादा विज्ञापन हमारी जरूरतों के प्रति जागरूक रहता है। सुबह सुबह कौन सा टुथपेस्ट हमारे दाॅतो के लिए लाभादायक है। ताजगी के लिए चाय कौन सी चाहिए। नहाते वक्त कौन सा साबुन त्वचा की रक्षा के साथ मैल में छिपे किटाणुओं को धो डालता है। तेल मसाले आटा से लेकर कौन सा नमक देश का नमक है जैसी बहुत सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन अकेला विज्ञापन सम्भालता है। बीबी को नही चिन्ता है कि आपके बाल सफेद हो रहे है तो इसे काला करना है किन्तु विज्ञापन को सदैव चिन्ता बनी रहती है। टीबी के प्रत्येक चैनलों ने इस महान काम को बखुबी अन्जाम देने की कसम खा रखी है। हम थोडा संकोची स्वभाव के है कोई भी नायिका टीबी पर मुस्कुराते हुए आकर कहती है कि यह क्रीम चेहरे को निखार देता है तो बस हम उसको ना नही कर पाते है। तुरन्त लेके आते है। पिता जी भी गंगा जल पीने की उम्र में वह पानी पीते है जिसे पीने के लिए ड्रीम गर्ल कहती है। हम संस्कारी लोग नारी का सम्मान करना अच्छी तरह से जानते है। अपने बजरंगी भाई जान दस रूपये के बोतल पीने के लिए कुछ तुफानी करते है। हम कह रहे है काहे को जान जोखिम में डाल रहे हो। तुम तो सेलिब्रटी हो कही मर मुरा गये तो, बोतल का क्या है वो तो बिक ही जायेंगे। बाद में हमें दोष दोगे कि समय रहते बताया नही। टेन्शन की अधिकता के चलते दिमाग जो कि शरीर के शायद सबसे उपरी भाग में होता है को शीतल करने के लिए सदी के महानायक तेल लगाने को बोलते है। हम दौड कर खरीद लाते है। भाई इतने बडे महान कवि का बेटा, सिनेमा जगत का सुपर स्टार एक कलर्क टाईप के आदमी को तेल लगाकर मालिश करता है। तो ठंढक और आराम तो जरूर मिलता होगा। कलर्क के भाग्य से जलन हो रही है । लेकिन वो ऐसा हमारे लिए कर रहे है ताकि हम समझे कि जीवन में कलर्क भी बनना हो तो भी तेल लगाना आवश्यक होता है। कदम कदम पर विज्ञापन हमारा ध्यान रखे हुए है। हम इन विज्ञापनों के आभारी है जो हम बीए की क्लास में न जान पाये थे हमारा बच्चा वो सब बचपन में ही जानने लगा है। विज्ञापन हमारी चिन्ता करता है और हम चिन्ता कर रहे है कि टीबी पर जब भी विज्ञापन आता है ’’नो चिपकोइंग बेच दे, बेच दे, पुराना ओलेक्स पर बेच दे ’’ तब बच्चे एक टक दादा दादी को क्यों देखते है।
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विज्ञापन न होते तो हमारी चिन्ता कौन करता ?
हम अक्सर सोचने पर मजबुर हो जाते है कि अगर विज्ञापन न होते तो इस खुदगर्ज जमाने में हमारी इतनी चिन्ता कौन करता ? जितनी भगवान को हमारी अनिवार्य आवश्यकताओं की चिन्ता नही है कही उससे जियादा विज्ञापन हमारी जरूरतों के प्रति जागरूक रहता है। सुबह सुबह कौन सा टुथपेस्ट हमारे दाॅतो के लिए लाभादायक है। ताजगी के लिए चाय कौन सी चाहिए। नहाते वक्त कौन सा साबुन त्वचा की रक्षा के साथ मैल में छिपे किटाणुओं को धो डालता है। तेल मसाले आटा से लेकर कौन सा नमक देश का नमक है जैसी बहुत सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन अकेला विज्ञापन सम्भालता है। बीबी को नही चिन्ता है कि आपके बाल सफेद हो रहे है तो इसे काला करना है किन्तु विज्ञापन को सदैव चिन्ता बनी रहती है। टीबी के प्रत्येक चैनलों ने इस महान काम को बखुबी अन्जाम देने की कसम खा रखी है। हम थोडा संकोची स्वभाव के है कोई भी नायिका टीबी पर मुस्कुराते हुए आकर कहती है कि यह क्रीम चेहरे को निखार देता है तो बस हम उसको ना नही कर पाते है। तुरन्त लेके आते है। पिता जी भी गंगा जल पीने की उम्र में वह पानी पीते है जिसे पीने के लिए ड्रीम गर्ल कहती है। हम संस्कारी लोग नारी का सम्मान करना अच्छी तरह से जानते है। अपने बजरंगी भाई जान दस रूपये के बोतल पीने के लिए कुछ तुफानी करते है। हम कह रहे है काहे को जान जोखिम में डाल रहे हो। तुम तो सेलिब्रटी हो कही मर मुरा गये तो, बोतल का क्या है वो तो बिक ही जायेंगे। बाद में हमें दोष दोगे कि समय रहते बताया नही। टेन्शन की अधिकता के चलते दिमाग जो कि शरीर के शायद सबसे उपरी भाग में होता है को शीतल करने के लिए सदी के महानायक तेल लगाने को बोलते है। हम दौड कर खरीद लाते है। भाई इतने बडे महान कवि का बेटा, सिनेमा जगत का सुपर स्टार एक कलर्क टाईप के आदमी को तेल लगाकर मालिश करता है। तो ठंढक और आराम तो जरूर मिलता होगा। कलर्क के भाग्य से जलन हो रही है । लेकिन वो ऐसा हमारे लिए कर रहे है ताकि हम समझे कि जीवन में कलर्क भी बनना हो तो भी तेल लगाना आवश्यक होता है। कदम कदम पर विज्ञापन हमारा ध्यान रखे हुए है। हम इन विज्ञापनों के आभारी है जो हम बीए की क्लास में न जान पाये थे हमारा बच्चा वो सब बचपन में ही जानने लगा है। विज्ञापन हमारी चिन्ता करता है और हम चिन्ता कर रहे है कि टीबी पर जब भी विज्ञापन आता है ’’नो चिपकोइंग बेच दे, बेच दे, पुराना ओलेक्स पर बेच दे ’’ तब बच्चे एक टक दादा दादी को क्यों देखते है।
प्रधानमंत्री की पाक यात्रा और बाबा बटुकनाथ
चाय की अडी पर बाबा बटुकनाथ बहुत नाराज मुद्रा में चुपचाप विराजमान थे। हमेशा देश की समस्या पर बेवाक टिप्पणी करने वाले बाबा का मौन धारण तमाम अडीबाजों को खल रहा था। बात मैंने शुरू की, बाबा ! प्रधानमन्त्री के अचानक संक्षिप्त पाकिस्तान यात्रा और लाहौर में भव्य स्वागत से कान्ग्रेसीजन काफी नाराज दिख रहे है। बस मेरी बात समाप्त ही हुई थी कि बाबा का मौखिक तापमान बढ गया। अपने चिरपरिचित अन्दाज में बोले-नाराज तो हाफिज सईद भी है उसने तो शरीफ साहब को सख्त हिदायत दी थी कि मोदी जी से ये कत्तई न पूछे कि ’’और बताइए क्या लेंगंे’’ ? मोदी जी को बता के जाना चाहिए जैसे पप्पू की मम्मी अपने इलाज के लिए जब विदेश जाती है तो सबको बता के जाती है। वो कौन सी बीमारी है जिसका आज तक किसी को पता नही चला। हां अलबत्ता पप्पू जरूर बता कर चिन्तन करने बैन्काक जाते है। भाई साहब आप तो गये है बैन्काक, और यदि नही गये है तो जाइये आप को पता चल जायेगा कि बैन्काक में सबकुछ हो सकता है लेकिन चिन्तन नही हो सकता। कहने को क्या है आप का मुंह है जो मन में आये बकिये। तथाकथित बुद्धिजीवी की तरह असहिष्णुता रूपी फोल्डिंग वाली कुर्सी को जब मन करे खोलकर बैठ जाइये और जरूरत न हो तो समेट कर किनारे लगा दिजीये। कहने को तो यह भी कहा जा सकता है कि असहिष्णुता से परेशान लोगों के लिए पाक में प्लाट देखने गये थे। गुरू रहस्य कि बात यह है कि मोदी जी पाकिस्तान में शान्ति का पैगाम लेकर गये थे, वो क्या है कि गदर में जिस जगह से सनी देयोल ने हैन्डपाईप उखाडा था भारत सरकार अब अपने खर्चे से वहाॅ समरसेबुल पम्प लगवायेगी और सारे मसले हल हो जायेंगे। खुशी तो यह है कि बजरंगी भाई की तरह अपने मोदी भाई भी बिना बीजा के ही पाकिस्तान होकर लौट आये है और ये जो विरोधी है बिना मतलब के शोर मचाये हुए है। देश में इतनी सर्दी में भी लोग अभी भी फुटपाथ पर सो रहे है और इन्हे तो सोने के लिए, शोर मचाने के लिए, हाथपाईं करने के लिए भी नया संसद भवन चाहिए। बनना भी जरूर चाहिए क्यों कि इनकी काॅव किचकिच सुनकर वर्तमान संसद भवन की दिवारें घायल हो चुकीं हैं। जैसे बुद्धिहीन लडका पढने की जब सोचता हैै तो सबसे पहले नई कापी खरीद कर लाता है। सांसदों पर काम करने का दबाव बना तो नया संसद भवन बनाने की मांग कर बैठे। पुराने का भवन ही खराब है यदि ये इसमें काम करने लगे तो ढह भी सकता है। इनहें कहाॅ पता है कि इसकी नींव में गारा मिट्टी की जगह करोडों हिन्दुस्तानी की आस्था एवं बलिदानियों का रक्त लगा है।
भउजी तो हार गयी परधानी
भउजी को आस पास घेर कर खडे होने वाले लोग उनके अपने कहे जाने वाले आदमी थे। जो चेहरे से उदास और देखने से मायूस दिखने का सफल प्रयास कर रहे थे। लेकिन लग ऐसा रहा था जैसे सब किसी न किसी मजबुरी या विशेष दबाव के चलते इक्ठ्ठे किये गये हो। कारण भी साधारण नही है। भउजी परधानी का चुनाव हार गयी है। कलतक परधानी के चुनाव में भउजी के लिए तन और मन से लगे लोग आज सम्बोघन के लिए उचित शब्द भी नही तलाश कर पा रहे थे। पूरे चुनाव के कर्ता धर्ता भउजी के हार जाने पर हाथ पर हाथ धर्ता बने बैठे थे। जीत की सम्भावना से मंगाये गये लड्डू डिब्बों में मुंह छिपाये पडे थे। जैसे पुराने जमाने की नयी नयी दुल्हन घूुन्घट कीये बैठी हो। जलपानानुरागी कार्यकर्ता उन्हें खा जाने वाली नजरों से घूर रहे थे। मतदान के पहले वाली रात को बदले हुए समीकरण के चलते ही आज की शाम ने बदनामी की डर से कुहरे की चादर से अपना मंुह ढक लिया है। बैठक कक्ष में अपने अपने तरीके से हार की समीक्षा बैठक हो रही है। सास ननद को दी जाने वाली सारी देशज गालियाॅ भउजी को याद थी वो चाहती तो इस हमदर्द भीड को दो मिनट में किनारे लगा सकती थी लेकिन इसका प्रयोग विपक्षी के लिए, या चुनाव लडने के लिए उकसाने वाले अपने पति के लिए करना उचित लग रहा था। क्यों कि जो हाथ सास ससुर को अभिवादन के लिए संकोच बस कभी कभी उठ जाते थे वहीं हाथ इस पति नामक जीव के कहने पर एक एक वोट के लिए हमेशा जुडे रहे। जिनका मुंह न देखने लायक था उनके चरण धरने पडे। भउजी तो ये भी समझती है कि ये गााॅव वाले थोडी देर बाद नव निर्वाचित भउजाई को बधाई देने जरूर जायेंगे। अतः बार बार सहज होने का असफल प्रयास कर रही थी। भउजी का चेहरा थका थका लग रहा था हालाकि पिछले एक महिनों से जन सम्पर्क के अलावा कोई थका देने वाला काम नही किया था। शायद भविष्य की चिन्ता से चेहरे का मेकप उड गया था। मतगणना के बाद भउजी और साडी दोनो की अकड ढीली पड गयी है। न आने वाले लोग निष्ठा पर सन्देह न हो जाय इसलिए मोबाइल पर उपस्थिति और सान्त्वना प्रगट कर रहे हैे। बीच बीच में भउजी मुस्कुरा भी देती है, लेकिन कार्यकर्ता ऐसा बातावरण बना चुके है, जैसे जता रहे हो कि भउजी की हार से सारा इलाका ही गमगीन है। कोने में खडा ड्राइबर भी समझ चुका है कि अब कहीं नहीं जाना होगा भउजी तो हार गयी परधानी।
विधायक हैं च्यवनप्राश नही तो क्या घास खायेंगे ?
बीरू सरदार की दुकान पर गरमा गरम चाय का गिलास थामते हुए बाबा बटुक नाथ ने सूफियाने अन्दाज में दार्शनिक वक्तब्य देना शुरू किया- दिल्ली कोई छोटा मोटा शहर नही है वहाॅ राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय, सरकारी, उद्योगपति से लेकर करोडपति तक हर तरह के लोग रहते है वहाॅ का विधायक होना साधरण सी बात नही है। जो इनका वेतन लगभग 2.4 लाख हो गया तो आप माथा पीट रहे है। इन विधायको की कोई सुनता ही नही था इनका हाल भी जनता की तरह हो गया था। कितने दिनों से इनकी ईच्छा थी की वेतन बढा दिया जाय लेकिन कोई सरकार सुनती ही नही थी भला हो केजरीवाल जी का जिन्होनें सहयोगियों के बेमौसम खाॅसने का मतलब समझ गये। अब देखिए न महंगाई कितनी बढ गयी है। आप क्या समझते है कोई इन नेताओं को नही बतायेगा तो इन्हें पता ही नही चलेगा। जब सब कह रहे है तो जरूर सही ही कह रहे होंगे। महंगाई जरूर बढी है और वेतन कितना बढा है पहले से मात्र चार सौ प्रतिशत ज्यादा। भाई साहब ! ये दिल्ली के विधायक है गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वाली जनता समझ रखे हो क्या। लाख पच्चास हजार में आजकल होता ही क्या है। ये तो इनके बच्चों की पाकेट मनी से भी कम है। बीबी के खर्चे सुनोगे तो कुवांरे मर जाने का मन करने लगेगा। तब से कचोधन कुट रहे है कि वेतन बढाने की क्या जरूरत है। तो गुरू विधायकी ऐसे ही थोडे मिल जाती है। तमाम तरह के हथकन्डे अपनाने पडते है। कर्मचारी तक छठवाॅ वेतन मान पा रहे है। जबकी पद स्थाई है। पर इनका क्या परमानेंट नौकरी तो है नही कल को विधायक नही रहे तो। बेरोजगार आदमी तक अपने बीबी बच्चों के लिए चिन्तित रहता है तो क्या ये लोग अपने बच्चों कों अनाथ छोड दें। इन्हें भी अपने बाल बच्चों का भविष्य संवारना है। भविष्य में इनके बच्चों को चुनाव लडना होतो खर्चे कहाॅ से आयेंगे। अब देश को आम जनता के भरोसे तो नही छोडा जा सकता ।
खानपान का भी विशेष ध्यान रखना पडता है पता नही कब विधान सभा में विपक्ष के साथ खुद भी नंगा होना पड जाय। विधायक है च्यवनप्राश नही तो क्या घास खायेंगे। सगी पत्नी से लेकर सहयोगी महिलाओं के विषय में भी सोचना पडता है। नही तो पता चला संविधान के हिसाब से महिला के अधिकार का हनन हुआ है। देते रहो अखबार वालो को जबाब। बुढापे में डीएनए टेस्ट का फजीहत अगल से है। फिलहाल दिल्ली सरकार ने विधायकों के दर्द को समझते हुए वेतन में चार गुना वृद्धि करकें एक महत्वपूर्ण काम किया है। पर इतने से भी होता क्या है ? क्या देती है सरकारें इन विधायकों को ? फ्री का आवास, भत्ता, थोडी पेंशन, और फ्री में रोडवेज बस तथा रेलवे का पास। इसमें कौन सा अहसान करती है सरकारें हमारे विधायकों पर। परिवहन और रेल के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी तक को यह सुविधा आजीवन मिलती है। वैसे काम तो इनका दस लाख महिने से भी नही चलेगा। लेकिन देश की खातीर तब तक ये बेचारे विधायक 2.4 लाख महिने में ही जैसे तैसे गुजर बसर कर ही लेंगे। अब तक बाबा बटुक नाथ की चाय और व्याख्यान माला दोनों समाप्त हो चुकी थी।
ये देश नही मेरी जान है जिसे हिन्दूस्तान कहते है।
सबेरे सबेरे पति द्वारा बनाई गयी चाय में बिस्किट डूबोकर खाती हुई अलसाई बीबी की बात को देश की चिन्ता मानकर सार्वजनिक रूप से शेयर करने वाले पति को हम बेवकूफ पति समझते है। शायद आप भी ऐसा ही समझते होंगे और जो ऐसा न समझे जरूर किसी दुसरे गोले से आया होगा। जैसे निरन्तर मफलर लगाने वाले आदमी को देखकर साइबेरियन पंछी भारत की तरफ उडान नही भरते ठीक वैसे ही मेकपयुक्त बीबी की औचित्यहीन बातों को सुनकर बेतुक्के बयान नही दिये जाते। औघढ की गाली, बीबी के थप्पड और मसखरे की बात को बुरा नही मानना चाहिए और न इसे गम्भीरता से लेना चाहिए। हां अगर जबान फिसल जाये लोग अपने तरीके से मतलब निकालने लगे तो उसका क्या किया जा सकता है। जैसे बिहार के डीप्टी सीएम की फिसल गई और अपेक्षित की जगह उपेक्षित निकल गया। शराब बन्दी का मतलब बिहार वाले शराब के बाद होने वाली बन्दी से लगा रहे है। चर्चा तो यह भी है कि सुशासन बाबु नशबन्दी लागू करना चाहते थे लेकिन डिप्टी सीएम के पापा कही इसे व्यक्तिगत हमला न समझ ले ऐसा सोच कर उन्होने अपने सुविचार त्याग दिये। उधर तस्करों ने महावीर की ऐतिहासिक प्रतिमा चुराने का दुस्साहस कर बिहार के पर्यटन उद्योग को करारा झटका देते हुए खुद के लघुउद्योग पुनः धीरे धीरे स्थापित करने शुरू कर दिये है। दो महान विभूतियों के गले मिलने पर किचकिच अच्छी बात नही है। आपसी भाईचारे के लिए गले मिलने में कोई बुराई की बात नही है जबकि भाई तो वो है ही चारा भी उनमें कुट कुट कर भरा है। जनता को भरोसा करना चाहिए। जिसे भारत के चिकित्सक लाडलों की चिकित्सा प्रणाली पर तनिक भी भरोसा नही है वो माॅ भी चाहती है कि उसके बकलोल लाडले पर भारत आॅखें मून्द कर भरोसा कर लें। हमें तो कभी कभी देश का भाग्य उस कसाई के जैसे लगने लगता है जिसे बकरे से मुहब्बत हो गई है। देश की यह भी एक समस्या है कि बुद्धिजीवी बुद्धुजीवी की तरह व्यवहार करने लगें हैं।
हमारे परम प्रिय पडोसी मित्र नेपाल ने भारतीय मीडिया पर बैन लगा दिया है। अब भरत को भी यही काम कर लेना चाहिए। दंगे फसाद असहिष्णुता जैसे मुद्दे अपने आप समाप्त हो जायेंगे। मीडिया नकरात्मक खबरे दिखाना बन्द कर दे। हर पक्ष की न्यायोचित खबर दिखाये तो ना असहिष्णुता रहेगी और न ही इस पर बहस की जरूरत पडेगी। हमलोग जहाॅ रहते है वहाॅ
नफरत की भावना को भी बडे प्यार से सहते है। ये देश नही मेरी जान है जिसे हिन्दूस्तान कहते है।
उल्लुओं का अधिवेशन
सम्मानित शहर के बीचो बीच स्थित एक सभागार में धिरे धिरे तरह तरह के उल्लू एक़त्रित हो रहे थे। एक ही जगह पर एकसाथ सामाजिक राजनैतिक साहित्यिक आदि क्षेत्रों से आये इन प्रतिष्ठित उल्लुओं को देखकर आश्चर्य हुआ। पूछने पर पता चला कि उल्लुओं का वार्षिक अधिवेशन है अतः हर उल्लू अपने अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहा है। देखते ही देखते पुरा सभा हाल मूंछ वाले, पूंछ वाले, सदरी और टोपी वाले उल्लुओं से खचाखच भर गया । दो तीन फीमेल उल्लू भी थी। जिनकी साज सज्जा इतनी मनोहारी थी कि यदि उल्लू देख सकते तो अपलक इन्हें ही देखते रहते।
एक नवोदित उल्लू जो कोने में बैठा था उसने बताया कि हम अन्धकार के समर्थक प्रजाति के लोग है बेशक हमें दिन में दिखाई न पडता हो लेकिन माता लक्ष्मी को पीठ पर लाद कर ढोते रहने के चलते इस युग में भी हमारी प्रासंगिकता को नकारा नही जा सकता। हमलोग अपनी उपयोगीता को सिद्ध करने के लिए ही इस महाअधिवेशन में एक़ित्रत हुए है। तबतक ललाट पर दिव्य चन्दन लगायें, मुख में चेला द्वारा प्रदत्त मगही पान दबायें, लकालक धोती कुर्ते में एक विद्वान टाईप के उल्लू का सभाकक्ष में
प्रवेश हुआ । एकदम खानदानी उल्लू की तरह । सारे उल्लू लपक लपक के उस दिव्यात्मा उल्लू के चरण छूने लगे।
चरण छू कर भी उल्लू बनाया जाता है पहली बार देखने को मिला। पता चला उल्लुओं के अधिवेशन की अध्यक्षता इन्हीं को करनी है।
आप भी सोच रहे होंगे किस पट्ठे से पाला पड़ा है , तो साहब ! उल्लुओं पर लिखना कम उल्लूपना नही है। आईये हम सीधे अध्यक्षीय सम्बोधन की ओर चलते है क्यों की छोटे मोटे उल्लू जो दरी बिछाने से लेकर निमन्त्रण बांटते हुए पोस्टर चिपकाते रहे उनको लिफाफा तो मिला लेकिन माईक मंच नसीब न हो सका। वो अगले साल का आश्वासन पाकर ही खुश होकर उल्लू बने रहे।
अध्यक्ष जी ने तमाम उल्लुओं को सम्बोधित करते हुए कहा- मेरे स्वजातीय बन्धुओं , उल्लुओं के इस महान अधिवेशन में जिन लोगों ने तन मन और धन से हमारा सहयोग किया हम उनका आभार ज्ञापित नही करेंगे क्यों कि वे इसी के लायक है। हमरा उल्लू समाज भगवान से भी बड़ा है। भगवान चाह कर भी किसी उल्लू को आदमी नही बना सकता और हम हर आदमी को उल्लू बना सकते है।
देश के उल्लुओं एक हो जाओं हर क्षेत्र में हमारे पट्ठे है। कृशन चन्दर नामक लेखक ने तो गदहों को भी साहित्य में स्थान दिलाया है तो क्या हम किसी उल्लू को साहित्य में स्थापित नही कर सकते ? इस अधिवेशन के जो महासचिव है वो हमारे परम मित्र है। हलाकि लोग इन्हें काठ का ही मानते है
। कुछ नवोदितों ने इनकी जगह हथिया ली है यह घोर चिंतन का विषय है। लोग दल तक बदल लिए ये अपना कोटर तक नही बदल पाये। आप जैसे लोग न होते तो हम जैसे उल्लओं को कौन पूछता। हमें भी वंशवाद की तरह उल्लूवाद को प्रोत्साहित करना होगा।अपने अपने उल्लू सन्तानों को मरने से पहले स्थापित कर देना होगा ताकि मरने के बाद हमारी निजी सन्तानें हमें एकदम से उल्लू ही समझती न रह जाये। जब एक ही उल्लू काफी है बर्बाद गुलसिताँ करने को , तो हम सब तो काफी संख्या मेंं एकत्रित है। सोना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है लेकिन सरकारी कर्मचारी रोज हमारे अधिकार का हनन कर रहे है। सरकार सोने का मूल्य एक बार निश्चित रूप से निर्धारित कर दे। तब हम चैन से सो पायें। फ़िलहाल एक बात तो स्पष्ट होगयी है कि हम उल्लुओं ने साहित्य के क्षेत्र में अपना उल्लू सीधा कर लिया है।
असहिष्णुता पर किचकिच
चैराहे पर चाय पान की दुकानों से लेकर यात्रा के दौरान बस रेल में सफर करते समय, यहाॅ तक की अन्तिम यात्रा में भी एक शब्द बहुत चर्चा में आया है ’’असहिष्णुता’’। जिधर देखो उधर असहिष्णुता पर हाय तौबा मची हुई है। आलम यह है कि नमस्कारी के बदले सौ का नोट थमाने वाले साले भी असहिष्णु लगने लगे है। सगे सम्बन्धियों के बीच या बाजार में भी थोडी आवाज तेज हुई नही की डर लगने लगता है कि सामने वाला असहिष्णु न मान ले। असहिष्णुता अब सपने में भी तरह तरह का रूप धारण कर कें आने लगी है। बीबी बच्चों के जायज नाजायज मांगों पर अब कोई भी प्रतिवाद करने का हिम्मत नही जुटा पाता, पता नही कब ये असहिष्णु समझ कर नवम्बर में ही मार्च निकालने लग जायें, और यदि चैनल वालों ने संूघ लिया तब तो आप की खैर नही। इसलिए आप सभी जन मेरी तरह ना नुकुर करने की आदत को छोडिये और परिवार समाज तथा देश की सहिष्णुता को बरकरार रखिये।
असहिष्णुता के नाम पर इतने ताशे बजाये जा रहे है कि अब ये शब्द कभी कभी मजाक जैसा लगने लगा है। शायद सरकार बदलते ही सहिष्णुता भी अपना अर्थ बदल देती है। या तो वयक्तिगत लाभ लाभ के लिए लोग बाग बदल लेते होंगे । जैसे बिहार में एक दुसरे के कट्टर दुश्मन पिछले दिनों चुनावी समीकरण के हिसाब से परस्पर सहिष्णु हो गये। और कही भी न गलने वाली उनकी दाल बिहार में गल गई। एक बार तो ऐसा भी लगता है कि ये चुनाव ही असहिष्णुता की जड है। ये कम्बख्त चुनाव खत्म असहिष्णुता समाप्त हो जाती है। पुरे विश्व को हमसें सहिष्णुता सिखनी चाहिए। खासकर पेरिस और फ्रांस को, हम जितने देर में दुकान से कैन्डिल खरिदकर मार्च निकालने की तैयारी करते है इतने देर में इसने तो सामने वाले की एैसी तैसी कर दी , इनका ये काम असहिष्णुता के अन्दर आता हैं। सहिष्णुनता की नई परिभाषा यह है कि कोई आपके शान्तचित्त विकसित हो रहे दोनों गालों पर लागातार तमाचा मारे तो आप सविनय निवेदन करें कि मान्यवर आप धन्य है यदि मेरे पास भगवान का बनाया हुआ कोई तीसरा गाल भी होता तो मैं आपके समक्ष जरूर प्रस्तुत करता। सहिष्णुता कब कायरता का रूप धर ले पता ही नही चल पाता। बकौल कवि यह भी यह भी याद रखना चाहिए कि-
कायरता जिस चेहरे का श्रृंगार करती है
वहाॅं मक्खी भी बैठने से इनकार करती है
कहो फलाने ! अब का होई
बिहार में हुए चुनाव नतिजों को लेकर एग्जिट पोल ही नही शुरूआती रूझानों तक में इलेक्ट्रानिक मिडिया से लेकर पार्टियां तक पशोपेश में पडी रही। सबसे खराब हालत समर्थकों का हुआ जो यही नही समझ पाये कि हंसे या गाल फुलावे। भारतीय जनता पार्टी की दशा उस भकुआये दुल्हे की तरह होगई जिसको शादी के मंडप में पता चला कि दुल्हन ऐन मौके पर प्रेमी के संग फुर्र हो गई है।
अलबत्ता कांग्रसियों को बहुत दिनों के बाद खुशी मनाने का मौका हाथ लगा है कुछ कार्यकर्ता तो इतने खुश है कि मिठाई में आग लगा के सुतली बम को लड्डू की तरह खा गये। किसके किसके नाम गिनायें और भी बहुत लोग खुश हैं। जैसे शत्रुघ्न सिन्हा भी खुश है आखिर वो जो करना चाहते थे कर लिए। सिंह साहब सियार वाली भषा बोल कर खुश है। स्थानिय नेता अपनी अहमियत समझकर प्रसन्न है। बी एल ओ मतदान का प्रतिशत बढाकर खुश है। पडोसी देश प्रधानमन्त्री की थकान भरी उदासी से खुश है। मांझी इसलिए खुश है कि जिसने उनकी नैया डूबाई थी उसकी नैया को डूबाने वाले भी अत्यधिक बलशाली के रूप में उभरे है। बिहारियों के आइकाॅन लालू जी और उनकी संतान सबसे जियादा खुश है, हे भगवान ऐसा बाप सबको दे, जो केवल पैदा ही नही करते बल्कि उनका भविष्य बनाने में क्या क्या तक नही कर देते। आखिर आज के युग में बेटे बेटियों के साथ रिस्तेदारों को भी सेटल कर देना महान काम है भाई। जिन्हें जंगलराज पार्ट 2 समझ में आ रहा है वो गम्भीरता से विचार करें । बिहार गौतम बुद्ध और महावीर जैसे ज्ञानियों की धरती है यहां अतिरिक्त ज्ञान देने की आवश्यकता नही है। बिहारी पर्यावरण के हिमायती है अतः इन्हें जंगल से स्वभाविक रूप से प्रेम है। जिस मसीहा की निगेहबानी में अपहरण, रंगबाजी, गुंडागर्दी जैसे घरेलु उद्योग पुनः फूल फल सकते हो उसी को लाना इनकी नैतिक जिम्मेदारी बनती थी। जिसका निर्वाह उन्होने किया। इसमें अन्य राज्यों के बुद्धजीवी अपना माथा ठोक कर सिर दर्द पैदा न करें। बिहार में जाकर सिकन्दर भी हार गया था। चाणक्य वही के थे वे कभी दूसरे छद्म चाणक्य के अनुसार नही चल सकते। बिहार चमत्कारी प्रदेश है उन्हें स्कूटर पर भैंस लादने की कला आती है। बात गाय से शुरू हुई थी गोबर पर खत्म हो गई। हां महागठबन्धन के दो नेताओ कों गले मिलते देखकर कर कुछ प्रबुद्ध लोगों ने मेरे कान में धिरे से यह जरूर कहा कि ऐसा लग रहा है कि चन्दन सांप की बाहों में खुद बखुद आगया है। तो कुछ सशंकित आत्माओं ने कैलाश गौतम की भोजपुरी कविता सुनाई कि-
धइलस छूटल घाट धोबिनिया
अब त पटक पटक के धोई
कहो फलाने अब का होई ।।
पंचायत चुनाव
डाॅ कलाम साहब ने एक बहुत बढिया बात कही थी।
मैंने एक चिडिया पाली, वह उड गई।
गिलहरी पाली वह भाग गई।
फिर मैंने एक पेड लगाया तो,
दोनों वापस आ गई। वैसे ही गाॅव के आदमी की थाली में दाल थी उसे महंगाई पी गई। उसकी रोटी मौसमों की बेवफाई खा गई। फिर पंचायत चुनाव आया उसकी थाली में ये दोनों चीजें वापस आ गई, साथ में दारू की बोतल और नमकीन की पाकेट भी आ गई। हे भगवान ये पंचायत चुनाव सालों साल क्यों नही चलते। इसके बीतते ही गाॅव कितना सुना सुना लग रहा है। गोहरी लगाती महिला के भी लपक कर पाॅव छूने वालो का तांता लगा रहता था। महिला उम्मिदवार का पति ’’नार्यास्तु यत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’’ वाली फीलिंग के साथ सबसे सम भाव से मिल रहा था। फिर भी मतदान के दिन मतदान केन्द्र पर कई लाठी उसकी पीठ पर गिरी थी। सारे प्रत्याशी जिस तेज गति से विकास का दावा कर रहे थे ऐसा लगता था अब ये गाॅव को एकदम लन्दन बना कर मानेगें। इस बार का चुनाव लोगों के लिए कल्पवृक्ष की तरह था जो माँगो तुरन्त हाजिर। थोडा सा आदमी बिमार पडे नही कि कई लोग ईलाज कराने को तैयार। आदमी तरसता था बिमार पडने को और यदि सौभाग्य से मर गया तो घर के बाकी सदस्यों की तो चकाचक। चार की जगह चैबीस कन्धा देने को तैयार । जीवित आदमी मरने वाले की तरीफ करे वाह क्या नसीब पाया है पंचायत चुनाव के वक्त ही मर गया। शव या़त्रा भी कितनी शानदार है। वो भी मुफ्त की। इन सारी सेवाओं के प्रति उम्मिद्वारों के मन में रति भर भी लालच नही अब लाभर्थी यदि इन सारी निस्वार्थ सेवाओं के बदले अपने पुरे परिवार का वोट उसे दे तो वह संकोचवश उसे मना भी तो नही कर सकता। जब से राजनीति सबसे सरल रोजगार हो गई है तबसे हर ऐरा गैरा अपना भाग्य आजमा रहा है। ये जो जनता है वो भी अबतक मतदान करते करते अपने मत की कीमत समझ गई है और अब वह उसे मत दान देने से पहले पुरा पुरा वसूल कर लेना चाहती है। जनता जानती है कि जब तक काली स्याही अंगुली में नही लगी है प्रधान जी तब तक ही पकड में है। अभी जितनी रोशनी चाहिए लेलो बाद में सूरज भी पहले इनके दवाजे पर ही उगेगा। जनता जानती है प्रधान कोई बने क्या फरक पडता है। गाडियाॅ वही रहती है केवल सवारियाॅ बदल जाती है।
मैंने एक चिडिया पाली, वह उड गई।
गिलहरी पाली वह भाग गई।
फिर मैंने एक पेड लगाया तो,
दोनों वापस आ गई। वैसे ही गाॅव के आदमी की थाली में दाल थी उसे महंगाई पी गई। उसकी रोटी मौसमों की बेवफाई खा गई। फिर पंचायत चुनाव आया उसकी थाली में ये दोनों चीजें वापस आ गई, साथ में दारू की बोतल और नमकीन की पाकेट भी आ गई। हे भगवान ये पंचायत चुनाव सालों साल क्यों नही चलते। इसके बीतते ही गाॅव कितना सुना सुना लग रहा है। गोहरी लगाती महिला के भी लपक कर पाॅव छूने वालो का तांता लगा रहता था। महिला उम्मिदवार का पति ’’नार्यास्तु यत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’’ वाली फीलिंग के साथ सबसे सम भाव से मिल रहा था। फिर भी मतदान के दिन मतदान केन्द्र पर कई लाठी उसकी पीठ पर गिरी थी। सारे प्रत्याशी जिस तेज गति से विकास का दावा कर रहे थे ऐसा लगता था अब ये गाॅव को एकदम लन्दन बना कर मानेगें। इस बार का चुनाव लोगों के लिए कल्पवृक्ष की तरह था जो माँगो तुरन्त हाजिर। थोडा सा आदमी बिमार पडे नही कि कई लोग ईलाज कराने को तैयार। आदमी तरसता था बिमार पडने को और यदि सौभाग्य से मर गया तो घर के बाकी सदस्यों की तो चकाचक। चार की जगह चैबीस कन्धा देने को तैयार । जीवित आदमी मरने वाले की तरीफ करे वाह क्या नसीब पाया है पंचायत चुनाव के वक्त ही मर गया। शव या़त्रा भी कितनी शानदार है। वो भी मुफ्त की। इन सारी सेवाओं के प्रति उम्मिद्वारों के मन में रति भर भी लालच नही अब लाभर्थी यदि इन सारी निस्वार्थ सेवाओं के बदले अपने पुरे परिवार का वोट उसे दे तो वह संकोचवश उसे मना भी तो नही कर सकता। जब से राजनीति सबसे सरल रोजगार हो गई है तबसे हर ऐरा गैरा अपना भाग्य आजमा रहा है। ये जो जनता है वो भी अबतक मतदान करते करते अपने मत की कीमत समझ गई है और अब वह उसे मत दान देने से पहले पुरा पुरा वसूल कर लेना चाहती है। जनता जानती है कि जब तक काली स्याही अंगुली में नही लगी है प्रधान जी तब तक ही पकड में है। अभी जितनी रोशनी चाहिए लेलो बाद में सूरज भी पहले इनके दवाजे पर ही उगेगा। जनता जानती है प्रधान कोई बने क्या फरक पडता है। गाडियाॅ वही रहती है केवल सवारियाॅ बदल जाती है।
महान तो वही हुआ जिसे पत्नी ने पीटा
जिस दिन से समाचार पढा कि हिलेरी भी अपने पति क्लिन्टन को आये दिन पीटती थी तब से सृष्टि के समस्त नारियों के प्रति सम्मान और भी बढ गया है। पत्नी की पवित्र भावना को पति समझ ही नही सकता, आखिर मूर्ख जो ठहरा । पत्नी एक पूर्व राष्ट्रपति की तरह पीटती रही और पति वर्तमान पति की तरह मुहल्ला सिर पर उठा कर चिल्लाता रहा, कहां वह इसे अमेरिका के क्लिन्टन की तरह सम्मानित करती रही और पति इसे अपमान समझता रहा। इस अल्पज्ञान के लिए अबोध नासमझ पति को हो सके तो क्षमा कर देना चाहिए। चूंकि पति एक घरेलू प्राणी होता है इसलिए घर से बाहर भी कोई दूनिया है इससे सर्वथा अनभिज्ञ रहता है।
इसकी भी दो आॅंखें होती है जिससे यह भी आम जीव जन्तुओं की तरह मात्र देखने का ही काम कर सकता है। मुंह भी होता है जिसके खुलने की कोई गरान्टी नही होती। साल में एक दिन मजदूर दिवस होता है जिस दिन मजदूर भी छुट्टी मनाते है। पति के जीवन में ऐसा कोई भी दिन नही होता। हालाकि पति नामक जीव काफी कुछ आदमी से मिलता जुलता होता है। या यूं कह सकते है कि पति होने के पूर्व यह मनुष्य ही होता है जिसके नाक में पत्नी नामक नकेल होती है। इसलिए पति का खुश होना गृहस्थ जीवन में सबसे बडी दुर्घटना मानी जाती हैै। पति यदि डांट दे तो वह घरेलु हिंसा है ,अत्याचार है। पत्नी का बेलनात्मक प्रहार भी सत्कार है प्यार है।
पत्नियों ने आज तक इन निरूपयोगी पतियों को तुलसी, तुकाराम, कालिदास और आज के युग में क्लिन्टन जैसा महान बनाने का काम किया है। पत्नी न हो तो आप लंका जला सकते है लेकिन पत्नी हो तो सिगरेट सुलगा कर दिखाइये। बिना बीबी के आदमी एकदम राहुल गांधी हो के रह जाता है। सोचो कितना बडा त्याग है इनका, ये छोड दे या इनको पति छोड दे फायदा हमेशा पति का ही होता है। कितनी महान भूमिका होती है आदमी को महान पति बनाने में पत्नियों की। बिना पत्नियों के हाथ लगाये क्या मजाल कि कोई पति महान हो जाय। महान बनाने की कार्यशाला है पत्नियां इसलिए इनके पीटने को प्रसाद समझना चाहिए। इस नश्वर संसार में कोई ऐसा भी पति है क्या जो पत्नी के प्रकोप से प्रताडित न हुआ हो ? जब सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के पूर्व राष्ट्रपति अपनी सगी वर्तमान पत्नी के हाथों पीट सकते है तो आप और हमारे जैसे पति किस पेड के बैगन है। मुस्कुरा तो एसे रहे है जैसे आप कभी पीटे न गये हो। महान तो वही हुआ जिसे पत्नी ने पीटा।
वाराणसी में कर्फ्यू
कल शाम को सुनसान सडक पर मुझे अचानक कर्फ्यू मिला। बिल्कुल नये नये ससुराल गये दामाद की तरह। अभी वह लगने ही वाला था कि मैंने पूछ लिया - श्रीमान कर्फ्यू भाई ! तुमको तो हमलोगों ने वर्षो पहले बहुत गहरे दफना दिया था फिर तू जिन्दा कैसे हो गया। कर्फ्यू ने निर्विकार भाव से कहा- जब भी किसी शान्त शहर में किसी या़त्रा या रैली के दौरान अराजकतत्वों के हाथों में प्रतिशोध के पत्थर आ जाते है, जब अमन चैन के कानों में जिन्दाबाद मुर्दाबाद के नारों की आवाज टकराती है। जब जिन्दगी शैतानियत का सन्देश लेकर आती है। नगर की रफ्तार थम सी जाती है। चहल पहल, आनन्द कोसो दूर भग जाता है तब उस शहर में कफ्र्यू लग जाता है।
मैने कहा यार कर्फ्यू तू जब लगता है तब दुकानों में ताले पड जाते है अच्छे अच्छों को रोटी के लाले पड जाते है। कहकहे सांय सांय करते हुए विरानी में ढलते है। बच्चों को दूध तक नही मिल पाता और न घर में चूल्हे जलते है। रैलियों में नारे बाप लगाते है और सजा नन्हें मुन्ने बच्चे पाते है। फिर छत से शान्ति से गुटर गूं करने वाले कबूतर न जाने कहाॅ उड जाते है। कोई सन्त, महन्त, पादरी, पीर, फकीर आखिर इन्हें क्यों नही समझाता है कि धर्म सम्प्रदाय देवी देवताओं को तो शान्ति और इन्सानियत से प्यार है तो फिर सम्मानित शहर के होठों से खिलखिलाती हंसी छिनने का इनको क्या अधिकार है ?
कर्फ्यू रहस्यमय तरीके से मुस्कुराते हुये बोला- हे इन्सानियत के अलमबरदार बेवकूफ आदमी, जब किसी पार्टी, संगठन या प्रभावशाली व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा बुद्धि की अनुगामी हो जाती है। प्रभाव जब प्रदर्शन का रूप धर लेता है। आस्था दिलों को छोडकर जब सडक पर उतरकर आन्दोलन करने लगती है तब तब मेरे आने की सम्भावना बढ जाती है।
मैने कहा भाई कर्फ्यू जो उपद्रव मचाने के लिए सबसे पहले पत्थर चलाते है क्या केवल वही अपनी पीठ पर लाठी खाते है ? अरे हमने तो देखा है कि असली कलाकार तो साफ-साफ बच जाते है और सीधे साधे चिल्लाते हुए अपनी पीठ सहलाते है और कुछ तो तेरे आने के पूर्व ही बेहोशी की हालत में चिकित्सालय की शरण में पाये जाते है। अब तू कान खोल कर सुन ले, कोलाहलों की दीवार पर अफवाहों की ईमारत खडी हो नही सकती। चाहे इसे बनाने वाला कोई भी हो ये हमारी आपसी सूझ बूझ से बडी हो नही सकती। कर्फ्यू तू चाहे कितनी भी कोशिश कर ले बाद में पछताओगे। तुलसी कबीर के शान्तिप्रिय शहर में दो घन्टे से ज्यादा टिक नही पावोगे।
मन की बात
बहुत दिनों से मैं भी ’’मन की बात’’ करना चाहता था क्या करूं घर में कर नही सकता और रेडियो पर करने की न अपनी औकात है न कोइ फायदा। सो आप से कर रहा हूॅं। जब से सोच रहा हूँ तभी से मन में लड्डू फूट रहे है। व्यक्ति को हमेशा अपने मन की बात सुननी चाहिए। हालाकि कई बार मन की बात अधिक सुन लेने पर उसका असर तन पर होता है और तन टूट जाता है। ’’मन के हारे हार है मन के जीते जीत’’ मनः एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है। पूरा विश्व भैतिकवादी है केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहाॅ अध्यात्म का महत्व है। इसलिए मेरे बहनों और भाइयों मन को सांसारिक गतिविधियों में लिप्त न रखें। आटा दाल तेल प्याज जैसी तुच्छ नश्वर वस्तुओं में अपना ध्यान न लगायें। महंगाई इस देश की आत्मा सी है। यह अजर अमर है इसका रोना कदापि न रोयें । यह तो आज है कल थी और कल रहेगी भी। जैसे पुराने शरीर के जीर्ण शीर्ण हो जाने पर आत्मा नये शरीर को धारण कर लेती है ठीक उसी तरह पुरानी सरकार के चले जाने पर नई सरकार पुरानी सरकार की आत्मा को धारण कर लेती है अतः किसी प्रकार का संशय नही होना चाहिए। बिजली पानी सडक स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकतायें तो व्यक्ति को आलसी बनाने वाली है। हम तपस्वियों के वंशज है। हमें कदापि नही भूलना चाहिए कि हम आलरेडी विश्व गुरू है। हमें सोशल मिडिया फेसबुक ट्यूटर आदि पर अत्यधिक समय देना चाहिए ताकि हमें लाइक करने वाले और हमारे फालोवर्स की संख्या में बढोत्तरी हो सके। वरना हम इस मायावी संसार को कौन सा मुंह दिखाने लायक रह जायेंगे।
इधर पंचायत चुनाव की घोषणा क्या हुई गांवों में बहार जैसे आ गयी है। एक आदमी बिमार पड के देख ले बीस प्रधानी के उम्मीद्वार दवा करवाने को तैयार है। गाॅव का आदमी सोच रहा है। हे भगवान ! ये चुनाव का मौसम हमेशा के लिए क्यो नही होता है। प्रत्याशी ऐसे हाथ जोडे है। जैसे दिल्ली का वीआईपी डेंगू मच्छर के डर से जोडे हुये हो। दीवार फाॅंदने का जिनका ग्रामिण रिकार्ड था वो भी उमर की उतार में भाग्य आजमाने के लिए कमर कस चुके है। गाॅव का घीस्सू ओर हल्कू भी अब काफी समझदार हो चुके है। वो अपने एक वोट की कीमत समझ रहे है। अदम साहब के शब्दों में इन्हें मालूम है कि प्रधान की योजनाओं से इनकी झोपडी पर कोई असर नही होगा और शहर की सीध में जब प्रधान की कोठी बनेगी तो इनके लिए सूरज भी जरा तीरछे ही निकलेगा।
मूर्ति विसर्जन और नौजवानों का दर्द
घर में जब देवी देवताओं के साथ पूजा का कन्टेक्ट समाप्त हो जाता है तो माला फूल बची खुचीं हवन सामग्री को गंगा में फेंकने के लिए या तो फिर विभिन्न देवी देवताओं के मूर्ति विसर्जन के समय ही तो नौजवान गंगा किनारे पहुचतें थे इसी बहाने गंगा मईया से दरस परस हो जाता था और माॅ को भी लगता था कि हमारे नौजवान बेटे अभी उतना नालायक नही हुये है जितना इनके असली माॅ बाप समझते है। गंगा में मूति विसर्जन पर रोक लगने से सबसे ज्यादा आहत नौजवान वर्ग हुआ है। भारत एक उत्सवधर्मी देश है। नौजवान उत्सव का कोइ अवसर हाथ से निकलने नही दे सकते। इसी लिए तो घंटो लतियाये जाने पर भी स्कूल का मुँह देखना पाप समझने वाले भी सरस्वती पूजा में, बिमार माॅ के लिए दवा लाने में सौ बहाने करने वाले दुर्गा पूजा में और एकदम निकम्मे जन विश्वकर्मा पूजा में अत्यधिक भक्तिभाव से भाग लेते हैं। परिस्थितियों को कभी भक्ति भाव में बाधक नही होने देते नौजवान। मूर्ति विसर्जन यानी देवी देवताओं के विदाई का समय। कोमल हृदय वाले ये नौजवान विसर्जन के समय जितना दुखी होते है उतना तो कन्या के विदाई के समय उसका बाप भी नही होता होगा। आपने देखा होगा क्रान्तिकारियों की तरह सर पर लाल कफन बांधे , दिल को दहला देने वाले डीजे के साथ दुखी मन से सर्ट को कमर में लपेटे हुए, अर्द्ध नंगे बदन एक दुसरे पर गिरते पडते नाचते हुये पैदल पैदल चले जा रहे है। कुछ अति सम्वेदनशील तो सडक पर लोट कर नागिन की तरह तडपने भी लगते है। कुछ मौनधारी युवा जब विसर्जन की सह्य वेदना को घोट नही पाते तो लबे सडक पच्च पच्च थूकते जाते है आम लोग इसे गुटखा समझते है। मगर ये तो इनका गम है जो ये निगल नही पा रहे। कुछ का हृदय इतना जलता है कि मुंह से निकलते धुयें को साक्षात देखा जा सकता है। इनके नसों में जो आस्था का उन्माद दौडता है वो एक विशेष प्रकार के द्रव के चलते है जो दिखता नही है। बस उसका असर दिखता है।
मूर्ति विसर्जन से गंगा में प्रदूषण फैलता है यह तो एक बहाना है। शहर के सीवर और बडे बडे गन्दे नाले रोज गंगा में विसर्जित होकर क्या गंगा को प्रदूषित नही कर रहे ? कई सरकारी गैर सरकारी संस्थायें सफाई अभियाान के नाम पर बहती गंगा में रोज हाथ धो रही है। इनके हाथ लगने से भी गंगा प्रदूषित हो रही है। बरना आज तक कई सौ करोड रूपये गंगा सफाई के नाम पर खर्च हुये लेकिन क्या मजाल की एक रत्ती भी असर हुआ हो।
अब जब विसर्जन पर ही रोक लग गया है तो नौजवानों की धार्मिक आस्था के प्रदर्शन का क्या होगा ? विसर्जन जुलूश मे बनजे वाले शीला की जवानी, मुन्नी की बदनामी वाली निगुर्ण धारा के भजनों का क्या होगा ? शहर में साल भर मूर्ति स्थापना के नाम पर भैकाल बनाने वाली पूजा समिति का क्या होगा ? पूजा के नाम पर चन्दा का चर्वण करने वाले छुट्ट भय्ये युवा नेता का क्या होगा। शायद ही कोइ होगा जो नौजवानों के दर्द को समझ पाये।
टुडे इज हिन्दी डे
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विश्व हिंदी सम्मेलन
अरे कवि जी
आप जैसे विद्वान
प्रखर प्रवक्ता
मातृ भाषा हिंदी के लिए समर्पित रससिद्ध राष्ट्रीय कवि
को मेरी आँखे
विश्व हिंदी सम्मेलन में ढूंढ रही थी। नये नये लड़के गले में तख्ती लटकाये टीवी पर दिख रहे थे ।
और आप हिन्दी के उन्नयन के लिए घर बैठे कविता लिख रहे थे।
चौपट है का जी ?
आप जैसे विद्वान
प्रखर प्रवक्ता
मातृ भाषा हिंदी के लिए समर्पित रससिद्ध राष्ट्रीय कवि
को मेरी आँखे
विश्व हिंदी सम्मेलन में ढूंढ रही थी। नये नये लड़के गले में तख्ती लटकाये टीवी पर दिख रहे थे ।
और आप हिन्दी के उन्नयन के लिए घर बैठे कविता लिख रहे थे।
चौपट है का जी ?
जब यही अच्छे दिन है तो बुरे दिन क्या बुरे थे
बजार से लौट कर किराये के घर में गृहप्रवेश करती हुयी बीबी ने झोला किनारे पटका और साडी की पल्लू को कमर पर लपेटतीे हुई अबोध पति के समक्ष प्रश्नों के गोले दागने शुरू किये। यही है अच्छे दिन ? यदि इसे ही अच्छे दिन कहते है तो वो बुरे दिन क्या बुरे थे। जब सबकी हान्डी मे दाल गल जाती थी, प्याज काटने पर आॅखों में आॅसू आते थे खरीदने पर नही, तेल खाओ या लगाओ अपने औकात में रहता था, पाॅच रूपये में प्लेट फार्म टिकट मिल जाता था। बीबी को विपक्ष की तरह अकारण अक्रामक भूमिका में देखकर पति ने इस संकट से निजात पाने के लिए संकटमोचन का सुमिरन करते हुए बचाव की मुद्रा में कहा - भाई अच्छे दिन तो धीरे धीरे आते आते आयेंगे। अब अच्छे दिन साले साली या ससुराल वालों की तरह निर्लज्ज तो है नही कि अचानक आ धमके। जैसे एक समधी की नजर दूसरे समधी की खूंटे पर बंधी दुधारू भैंस पर होती है। ठीक वैसे ही बीबी की नजर पति के वाक्य पर होती है। उधर दुधारू भैंस न मिली तो समधी रूठा, इधर बीबी के मैके के विषय में दुधारू शब्द न निकले तो बीबी रूठी, अब दोनो को मनाने का सिलसिला महिनों चलता है। समधी और बीबी में एक अन्तर होता है समधी मान भी सकता है।
पत्नी जिसे खाली समझती है पति अपने उसी दिमाग वाले फ्लोर के शब्द कोष से मनाने के लिए कुछ मधुर शब्द खोज ही रहा था कि दुसरा हमला हुआ। सुनो जी! मैं तो उसी दिन से सोच रही थी कि भाषण में ’’न खउंगा न खाने दूंगा’’ का क्या मतलब हो सकता है लेकिन बात अब समझ मे आयी है। अरे तुम्हें न खाना है मत खाओ हमें तो जीने के लिए खाने दो। ताकि अच्छे दिन के लिए फिर बटन दबाने हेतु जीवित रहें। आखिर इतने शौचालयों और स्मार्ट शहरों की क्या उपयोगिता जब खाने ही नही दोगे।
अच्छे दिन की टीआरपी गिर रही है। आखिर किस के अच्छे दिन आये। गंगा, गोहत्या, घुसपैठ, कश्मीर, बेरोजगारी, किसान, नारी सुरक्षा, भरतीय रेल, धार्मिक उन्माद किसी के भी तो नही आये। चिराग लेकर ढूढा तो केवल चिराग के पापा के अच्छे दिन आये या तो फिर सास भी कभी बहु थी की बहु के अच्छे दिन आये। तेल प्याज दाल आटा का भाव पूछने के बाद मुंह लटकाये घर पहुचों तो पडोसन से मन की बात कहने का मन नही करता। पता नही लोग रेडियो पर कैसे कर लेते हैै। ऐसे अच्छे दिन से बुरे दिन क्या बुरे थे ? और नही तो क्या।
पत्नी जिसे खाली समझती है पति अपने उसी दिमाग वाले फ्लोर के शब्द कोष से मनाने के लिए कुछ मधुर शब्द खोज ही रहा था कि दुसरा हमला हुआ। सुनो जी! मैं तो उसी दिन से सोच रही थी कि भाषण में ’’न खउंगा न खाने दूंगा’’ का क्या मतलब हो सकता है लेकिन बात अब समझ मे आयी है। अरे तुम्हें न खाना है मत खाओ हमें तो जीने के लिए खाने दो। ताकि अच्छे दिन के लिए फिर बटन दबाने हेतु जीवित रहें। आखिर इतने शौचालयों और स्मार्ट शहरों की क्या उपयोगिता जब खाने ही नही दोगे।
अच्छे दिन की टीआरपी गिर रही है। आखिर किस के अच्छे दिन आये। गंगा, गोहत्या, घुसपैठ, कश्मीर, बेरोजगारी, किसान, नारी सुरक्षा, भरतीय रेल, धार्मिक उन्माद किसी के भी तो नही आये। चिराग लेकर ढूढा तो केवल चिराग के पापा के अच्छे दिन आये या तो फिर सास भी कभी बहु थी की बहु के अच्छे दिन आये। तेल प्याज दाल आटा का भाव पूछने के बाद मुंह लटकाये घर पहुचों तो पडोसन से मन की बात कहने का मन नही करता। पता नही लोग रेडियो पर कैसे कर लेते हैै। ऐसे अच्छे दिन से बुरे दिन क्या बुरे थे ? और नही तो क्या।
आरक्षण का हार्दिक प्रयोग
लगभग 6 करोड 27 लाख की आबादी वाले गुजरात में 12.50 फीसदी पटेल पाटीदार समुदाय के लोग रहते है। जिसमें 50 प्रतिशत पटेल हीरा व्यापार, कपडा और फार्मा की छोटी बडी कम्पनियों पर काबीज है। तो 30 फीसदी सरकारी सेवाओं में है। सरकार ने कितनी उपेक्षा की है पटेल समाज की। गुजरात में भरतीय जनता पार्टी के 120 में से मा़त्र 40 विधायक ही पटेल है। आनन्दीबेन पटेल सहीत 7 मन्त्री पटेल है। इस जगह नौजवान हार्दिक पटेल द्वारा आरक्षण का हार्दिक प्रयोग करने से सरदार बल्लभ भाई का तो बता नही सकता लेकिन केशु भाई पटेल जरूर प्रसन्न हो सकते है। भले दिल्ली से लेकर बिहार तक के चेहरे पर लकालक खुशी दिखाई दे रही हो लेकिन इतना तो तय है कि जिस राज्य में 52 वर्ष का आदमी भी ईमानदारी से काम कर के रोटी खाने में पूरा विश्वास रखता है वहाॅ के 22 वर्ष के युवाओं को आरक्षण की वैशाखी चाहिए खुद के पैरो पर खडा होने के लिए। आरक्षण का जन्म शायद इसलिए हुआ था कि समाज में सभी समान बने। लेकिन सत्ता की लोलुपता के चलते जब से यह आरक्षण जन्मा समाज में जातिगत द्वेष निरंतर बढता ही गया।
मेरे क्रान्तिकारी दिमाग के विस्फोटक विचार के अनुसार आरक्षण का असली हकदार, चाहे वह किसी भी जाति का हो देश का पति समाज है। जो युगों युगों से पत्नियों द्वारा शोषित और पद दमित है। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया जब कि उनका घर में सौ प्रतिशत प्रभाव जमा रहता है। पत्नी शोषित पति बेचारा अपने इच्छानुकूल तरकारी तक नही खा सकता। पत्नी अपने मनचाहा फैशनानुसार नये नये परिधान धारण करें और पति बेचारा अपने ही बनवाये घर में अर्धनग्न भी न हो सके। भले नेता सडक से लेकर संसद तक नंगे हो जाये। यदि आरक्षण का हार्दिक प्रयोग करना है तो इसे पति समाज के लिए किया जाय। पत्नी फुलन देवी हो या तुलसी टीबी का रीमोट इन्ही के हाथ में रहता है पति मुलायम हो या चालू मनपसन्द चैनल देखने का अधिकार पतियों को आज तक न मिल सका । या तो इन पीडित पतियों को आरक्षण दिया जाय या पति पद से मुक्त किया जाय। सोशल मिडिया पर भी हम जितना अपमान झेलते है उतना तो राष्ट्रीय पार्टी क्षेत्रिय पार्टी से गठबन्धन कर के भी नही झेलती होगी। पतियों के तमाम ट्रक छाप शायरी से लेकर ज्ञानवर्द्धक पोस्ट तक, एक एक लाइक के लिए हाथ जोडे तरसते रहते है। वही पत्नियां केवल निज फोटो चेंप दे तो टीप्पणियों की कतारें लग जाती है। पति आज तक इन पत्नियों के आगे अतिपिछडे के अतिपिछडे ही रह गये। चाहे विवाहित हो या क्वांरी किसी भी सरकार ने इनके तरफ ध्यान नही दिया। दुखडा तो बहुत है। असल में पत्नी पीडित शोषित पति समाज ही असली आरक्षण का हकदार है।
प्याज बिन कुछ भाता नही, खरीदा भी जाता नही
सरकार प्याज से जितनी डरती और चिन्तित रहती है उतनी शायद चीन पाकिस्तान के साजिश से भी नही । डरे भी क्यों नही, जब भी प्याज अपने ताकत का फतवा जारी करता है सरकार को अपनी और जनता को अपनी औकात का पता चल ही जाता है। प्याज का भूगोल गोल और इतिहास तामसिक है। गन्धयुक्त प्रवृति होती है प्याज की सुना है उत्तेजना प्रदान करता है। खुबी यह कि मुफ्त में आॅखों की सफाई कर देता है। जब प्याज को अपने इस नैसर्गिक गुण का पता चला तो उसने जेब की सफाई भी करने की ठान ली। अतः अब इस का प्रयोग किचेन में दवाई की तरह होने लगा है। अभी तक उस आदमी का कुछ भी पता नही चल सका है जिसने सबसे पहले प्याज का स्वाद लिया था। धार्मिक ग्रन्थों ने प्याज के भाव को गिराने का काफी प्रयास किया लेकिन असफल रहे। इस उपेक्षित प्याज को हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई चारों भाइयों ने खुले दिल से अपनाया। जैसे ही प्याज की पहूंच किचन तक हुयी। बस इसके भाव आसमान छूने लगेे। सारा जनमानस प्याज के भाव अभाव को लेकर तनाव में आगया है। पत्नी पीडित पति प्याज प्रताडित होकर एक हाथ से जेब दबाये बाजार में प्याज के प्रति प्यार उजागर करते हुये विरह विलाप कर रहा है।
कल हमने भी हिम्मत करके सब्जीवाले से पूछ ही लिया -भाई प्याज क्या भाव दिये। पहले तो उसने उपर से निचे तक हमें घोर आश्चर्य से निहारा। फिर रहस्यमय स्वर में बोला- छोडिये साहब आप शरीफ आदमी है भाव जानकर क्या करना है ? नाहक सुबह सुबह बोहनी बिगड जायेगी। खराब तो बहुत लगा था लेकिन साहब और शरीफ सुन कर मन ही मन खुश हो गया था। जैसे होमगार्ड का जवान अपने लिए साहब सम्बोधन सुनकर हो जाता है। साधारण आदमी को प्याज का भाव पूछने का कोइ अधिकार नही रहा अब शरिफों को मोहताज है प्याज। गरीब , मजदूर, और किसान सूखी रोटी प्याज से खाकर पेट भर लेते थे। अब यह प्याज उनका उपहास करके साधन सम्पन्न परिवार की प्रशंसा पाने लगा है।
हमारे मकान मालिक ने कमरा किराये पर देते समय सख्त हिदायत दी थी कि हमारे यहाॅ रहोगे तो प्याज नही खाओगे। तब अजीब सा लगा था। अब जाके समझ मे बात आ रही है उनकी दूर दृष्टि कितनी नेक थी। प्याज न खाने का जो अध्यादेश पारित था वो सचमुच बहुत अच्छा था। जिसके मुंह प्याज लगा वह आज आंसू बहा रहा है। प्याज बिना कुछ भाता नही है और खरीदा भी जाता नही है। सूदखोर सोच रहा है कि ब्याज लूं कि प्याज लूं।
बीबीयां ब्यूटी पार्लर में मसाज लेने की अपेक्षा प्याज लेना अधिक पसन्द कर रही है। आप मेरी बात मानकर कुछ दिनों के लिए ही सही मेरी तरह वैष्णव हो जाये
हमनें कुछ फाइल चबा ली तो बुरा मान गये
पिछले दिनों एक बहुत ही मजेदार खबर छपी थी कि प्रदेश के सचिवालय की कुछ फाइलों को दो कुत्तों ने बडी बेरहमी से फाड फाड कर चबा डाला। सवाल यह उठता है कि जिस सचिवालय में आम आदमी की पहूॅच नही है वहाॅ तक ये कुत्ते पहूॅचे कैसे ? एक कुत्ता स्वर्गारोहण के समय युधिष्ठिर के पीछे पीछे हिमालय तक चला गया था। कही सत्तारोहण के चक्कर में ये कुत्ते भी किसी नेता के साथ सचिवालय में तो नही पहूॅच गये थे ? खैर ये तो जाॅच का विषय है। हमारे जैसे लोग सचिवालय में पहूॅचकर फाइल चबाने वाले इन कुत्तों के विषय में केवल अनुमान ही तो लगा सकते है। आदिकाल से आदमी जिस पर सबसे पहले भरोसा किया वह कुत्ता था। तभी से वफादारी के उदाहरण के लिये कुत्ते का प्रयोग किया जाता है। जिन फाइलों पर कुत्तों ने अपनी वफादारी दिखलायी है हो सकता है बडे बाबू न दिखा पायें हों। अर्थात जो काम बडे बाबू न कर पाये कुत्तों ने कर दिया। ये तो कुत्तों की महानता है कि जनता के काम आ गये।
जबसे आदमी में कुत्तेपन की बढोत्तरी होने लगी है कुत्ते आदमीयत के ज्यादा करीब होने लगे है। हमनें एक कटप्पा जैसे स्वामीभक्त दिखने वाले कुत्ते से पूछा कि आदरणीय बतायें कि चूहे के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करते हुए आप के बिरादर ने क्यों सचिवालय की दो फाइलें चबा डाली। अगला ताव में आगया ! बोला- वाह भाई जब आरक्षण के चूहे प्रतिभाशाली नौजवानों की डिग्रियाॅ कुतर डालते है तब तो आप या आप की सरकार बुरा नही मानती और हमारे विरादर ने कुछ फाइल चबा ली तो बुरा मान गये। देखिये अब ये गली के बेरोजगार कुत्ते तो सचिवालय की फाइल चबा नही सकते जरूर वो अति महत्वकांक्षी सरकारी कुत्ते रहे होंगे। वरना सरकारी फाइलों का तो यमराज भी कुछ नही बिगाड सकते। इस साहसी कार्य के लिए कुत्ते सदैव याद किये जायेंगे। यही फाइल कोई कलर्क चबा जाता तब शायद यह खबर नही बनती । क्यों कि रोज छोटे मोटे कार्ययालयों में हल्की फुल्की दबाव विहीन फाइलें कलर्क के गाल में कवलित हो जाती है और किसी को कानों कान भनक तक नही लगती।
अखिल भारतीय श्वान एशोसिएशन भूंक भूंक कर सरकार से इस घटना की सी बी आई जाॅच कराने की मांग करती है ताकि जनता के सामने यह तथ्य उजागर हो सके कि कुत्ते ने बडे बाबू का काम किया है या बडेबाबू ने कुत्ते का।
सदन की कार्यवाही स्थगित है जी
महंगाई गरीब की हांडी में दाल नही गलने देती। बीबी बच्चों की फरमाइसें आम आदमी को गदोरी में सुर्ती तक नही मलने देती। फैशन नौजवान की आॅखों में स्थाई रूप से कोई एक सपना पलने नही देता। और ये सांसद संसदीय कार्यवाही को चलने नही देते। कार्यवाही स्थगित है जी। जो पक्ष में थे आज विपक्ष में है। जब ये सत्ता में थे तो विपक्ष वाले संसद की कार्यवाही चलने नही दिये थे आज ये विपक्ष में है अतः इनका नैतिक धर्म बनता है कि संसद की कार्यवाही ये भी चलने न दें। अब आप को कैसे बतलायें जी, जब मानसून स़त्र में बाहर बरसात हो रही हो और अन्दर गर्मागरम बहस तो इस मौसम में सदन की कार्यवाही स्थगित हो जाने पर कैन्टीन में सब्सीडी के पकौडे खाने का अपना एक अलग आनन्द होता है।
संसद भवन में सभा की अघ्यक्ष भी घर परिवार की उस लाचर बुढिया की तरह होती है जिसकी इज्जत तो सारी बहूए करती है लेकिन उसकी सुनता कोई नही है। इतने सुहाने मौसम में कोई माइक तोडे, हाथापाई करे, बिल फाडे गाली गलौज करे तो इसको मौसम का दोष मानना चाहिए न की माननीयों का। और इस मौसमानुकूल स्वच्छन्द आचरण के लिए पक्ष विपक्ष दोनों को धन्यबाद का पात्र समझना चाहिए। इस स्थिति के लिए इन्हे नहीं खुशनुमा मौसम को दोषी मानना चाहिए। संसदीय गतिविधियों के जानकार एक बुद्धिजीवी से इसके बारे में जानना चाहा तो बोले कि यह प्रश्नकाल नही है और इस शून्य काल में मैं कोई उत्तर नही देता। कभी कभी ऐसा लगता है कि पैसठ वर्षो में संसद को गठिया हो गया है जिसके चलते इसे चलने में परेशानी होती है। पिछले कई सालों से ऐसे ही रूक रूक के लंगडा के चल रही है। इसकी अपनी कोई चाल नही है। जब सांसद
चलाते है तो चलती है नही तो बैठ जाती है। भले देश बैठ जाये ये चल नही सकती। कितनी जिम्मेदारी है इन सांसदो के उपर पहले करोडो की पूंजी लगाकर चुनाव जीते और जब जीत कर सदन पहूचें तो काम क्या मिला सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलने देने का। घर में बीबी की सुनते सुनते तंग होकर इतना बडा इन्वेस्ट किये सब बेकार चला गया। जहाॅ पहूचे वहाॅ भी एक महिला की सुनते रहो।
वो क्या है कि प्रधानमन्त्री जी सुने उन्होंने घर में कभी नही सुनी कृपया बैठ जाइये। आप भी बीबी से एक कप चाय की फरमाइश किजीये जबाब मिलेगा । शून्यकाल है कार्यवाही स्थगित है जी।
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