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काम बोलता है

हर सुबह बोलता है हर शाम बोलता है
पत्थर भी तैर जाते हैं और नाम बोलता है
दुनिया समझ रही है तेरी गन्दी सियासत
चुप होते जहाँ राम वहीँ काम बोलता है
पता जिस दिन चलेगा बंद है सम्मान मुट्ठी में।
दबाकर रख नही पाओगे तब पहचान मुट्ठी में।
निशा देखेगी अपने भोर को घूँघट उठाकर के।
रखोगे कब तलक तुम कैद कर दिनमान मुट्ठी में।।