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गधा उवाच

माना हरियाली चर कहीं लोट जाता किन्तु
नेताओं से इसकी तो तुलना न कीजिये।
कभी निज मालिक को मारता दुलत्ती नही
दूजा उपमान कोई नया कर लीजिये।
सारी पार्टियों में नेक एक से भरे है एक
हाथ जोड़ धोबी बोला थोड़ा सा पसिजिये।
पेट पालने का नाथ यही एक साधन है
आप मेरे गधे पर दया कर दीजिये।

बुताय गई ढेबरी

धन्यबाद आपने बढ़ाया मान भारत का
सुनिये सुना रहा हूँ एक खुशखबरी।
लाभ जो कमाता रहा अपने यहाँ से और
पाक सा पड़ोसी उकसाता रहा जबरी।
सबक सिखाने हेतु उसे समझाने हेतु
हमने जो बांधी स्वाभिमान वाली पगरी।
सबने तो मिट्टी के जलाये इतने दीये कि
चिंग चांग चाउ की बुताय गयी ढेबरी।

पानी

छोड़ नदियों का तट सुनसान पनघट
फोड़ कर घट महबूब गया पानी है।
बड़े बड़े घरों के तरण ताल में है व्यर्थ
छोटे नलकों से बह खूब गया पानी है।
याचक हो सावन भी मांगने लगा है पानी
देते देते मानसून ऊब गया पानी है ।
कल तक कल कल झूम कर बहता था
देखो आज बोतलों में डूब गया पानी है।

बरसात

दादुर पपीहा मोर करने लगे है शोर
झूले पर चातक की चाह झूल गयी है।।
गोद में पयोद के ही बैठ कर चंचला भी
प्रकृति से अनुबन्ध भी कबूल गयी है।।
गरज रहें हैं घन घोर घन घेर घेर
द्रुम लता धरती कीआह भूल गयी है।।
बरसात होने लगी झम झमा झम झम
नदी नद पोखरों की साँस फूल गयी है।

कन्हैया

चोरी बरजोरी सब ठीक वनवारी आप
पूनम की रात मत वंशी को बजाइये।
टेर सुन आधी रात आना पड़ता है नाथ
लोक लाज की है बात यूँ न आजमाइये।
कहें तो कदम्ब छाँव आकर दबा दूँ पाँव
माखन खिलाऊँ नित बात मान जाइये।
किन्तु पनघट पर झट पट फोड़ घट
नटखट नटवर हमें न सताइये।।

कर्ण

मन्त्र की परीक्षा एक लेरही थी राजकन्या
और वो परीक्षा फल वरदानी हो गया ।
वरदान था की शाप था ये दिनमान जी का
बीती बात सोचकर ज्ञान ध्यानी हो गया।
कवच संयुक्त वक्ष बालक समक्ष देख
क्षणभर मातृ मन अभिमानी हो गया।
वही नवजात पड़ा गंगा जी की गोद में तो
सूर्य का प्रखर ताप पानी पानी हो गया।

श्रृंगार

पावस ऋतु में गोरी उपवन में गयी तो
सुमन भी झुक कर गंध सूंघने लगा।
आनन में कुमुद का भ्रम हुआ भ्रमर को
भ्रमित भ्रमर पीछे पीछे घूमने लगा।
काले केश राशि घन पवन उड़ाने लगे
पादप लता को अंक लेके चूमने लगा।
सुध बुध बिसरायी याद प्रीतम की आयी
अंग अंग में अनंग झूम झूमने लगा।

हास्य


प्रेम है अनन्त दिव्य सत्य का स्वरूप किन्तु
प्रेम को तो प्रेम से निबाहना जरुरी है।
कहते कबीर प्रेम पन्थ है कृपाण धार
आँखे मुद दौड़ कर चाहना जरुरी है।
दिल टूट जाये प्रेम में तो कोई बात नही
हाथ पैर टूटे तो उलाहना जरुरी है ।
प्रेमिका का भाई बन्धु खली सा बली हो तब
प्रेम का पयोधि अवगाहना जरुरी है ।

घनाक्षरी

पूछने लगे है सभी अब तेरे सपने में
कोई रूपवती आके आह भरती है क्या ?
जिसके अयन एक टक तू नी हारता था
तेरे नयनों से कभी नींद हरती है क्या ?
टप टप बारिस की बून्द जब टपके तो
हृदय विदग्ध कल्पनायें जरती है क्या ?
इतना तो चुपचाप कोई सह लेगा किन्तु
कैसे समझायें कि घटायें करती है क्या ?

देश के लिए .....

               घनाक्षरी
बनना पड़े सुमन किसी उपवन का तो
सैनिक चरण चूम पाने कि ललक हो !
शीतल समीर रूप यदि धरना पड़े तो
रणबांकुरों के शीश छाने कि ललक हो !
जन्म लेके मानव का आना हो हजार बार
राम कि ही भूमि पर आने कि ललक हो !
चाहे यम से ही दो दो हाथ करना हो किन्तु
देश के लिए ही मिट जाने कि ललक हो !

सिंघावलोकन

लोग कैसे हो गये न जाने इस भारत के
आरत पुकारत है तान कर सो गये।
सो गये जगाने वाले नैतिक पतन हुआ
धर्मरथ रथी और सारथी भी खो गये।
खो गये लोलुपता में त्याग तप बलिदान
मनुज दनुज बन विष वृक्ष बो गये।
बो गये बबूल किन्तु चाहते सरस आम
राम धरा धाम के ये लोग कैसे हो गये।।

घनाक्षरी

लोग कैसे हो गये न जाने इस भारत के
आरत पुकारत है तान कर सो गये।
सो गये जगाने वाले नैतिक पतन हुआ
धर्मरथ रथी और सारथी भी खो गये।
खो गये लोलुपता में त्याग तप बलिदान
मनुज दनुज बन विष वृक्ष बो गये।
बो गये बबूल किन्तु चाहते सरस आम
राम धरा धाम के ये लोग कैसे हो गये।।