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चैनल चार सदा चपको लपको
नवनीत न मण्ठ रखो।
देश विदेश पढ़ो कविता न
लिखो कविता मति सण्ठ रखो।
ज्ञान न हो रस छंद भले पर
संघ बनाकर लण्ठ रखो।
साध अबाधक मंच सखे कुछ
जोक सदा निज कण्ठ रखो।
घेरत है घनघोर घटा बिजुरी तन को सिहरावत है।
चातक बोलत भोर भये रति रंजित राग सुनावत है।
झींगुर शोर करे सब ओर लगे जस झाल बजावत है।
सावन में मन भावन की बतियाँ अति नेह बढ़ावत हैं !